अरोड़वंश परिवार
कुलदेवी माँ हिंगलाज भवानी
अरोड़वंश, महाराज श्री अरूट जी एवं अरोड़कोट का सम्पूर्ण प्रामाणिक इतिहास
1. वंश परंपरा और सूर्यवंशी क्षत्रिय मूल
वैदिक काल और क्षत्रिय वंशावलियों के अनुसार, अरोड़ा समाज का संबंध सूर्यवंशी क्षत्रिय कुल से है।
भगवान श्रीराम से जुड़ाव: भगवान श्रीराम के सुपुत्र महाराज लव की वंश परंपरा में अनेक महान योद्धा और राजा हुए।
राजा कालराय के पुत्र: महाराज लव के कुल में आगे चलकर राजा कालराय हुए। राजा कालराय के दो पुत्र थे—सोढ़ी राय और अरूट राय (महाराज अरूट जी)।
स्वाभाव और विभाजन: सोढ़ी राय अत्यंत युद्धप्रिय और क्रोधी स्वभाव के थे, जबकि अरूट राय धार्मिक, न्यायप्रिय, प्रजापालक और शांत स्वभाव के थे। राजा कालराय ने मंत्री की सलाह से अपने शांत और बुद्धिमान पुत्र अरूट राय को अपना खजाना और राज्य की जिम्मेदारी सौंपी।
2. 'अरोड़कोट' साम्राज्य की स्थापना और भूगोल
महाराज अरूट जी ने सिंधु नदी के तट पर एक अत्यंत भव्य, विशाल और सुरक्षा की दृष्टि से अभेद्य किला व नगर बसाया।
अरोड़कोट (Aror / Al-Rur): इस महान नगर का नाम 'अरोड़कोट' रखा गया (जो वर्तमान में पाकिस्तान के सिंध प्रांत में 'रोड़ी/सुक्कुर' के पास स्थित है)।
अरोड़वंश नामकरण: इसी 'अरोड़कोट' नगर में बसने वाले, महाराज अरूट जी के वंशज और उनके अनुयायी कालान्तर में 'अरोड़वंशी' और बाद में 'अरोड़ा' कहलाए।
3. प्राचीन व्यापारिक और सांस्कृतिक महाशक्ति
अरोड़कोट केवल एक राजनीतिक राजधानी ही नहीं, बल्कि उस दौर का भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक केंद्र था।
व्यापारिक सीमाएँ: अरोड़कोट का व्यापार उत्तर में कश्मीर, उत्तर-पश्चिम में कंधार (अफ़ग़ानिस्तान), पश्चिम में मकरान (बलूचिस्तान) और दक्षिण में सूरत (गुजरात) तक फैला हुआ था।
समृद्धि और सुरक्षा: प्राचीन इतिहासकार और 'गाज़ेटियर ऑफ़ सिंध' के अनुसार, अरोड़कोट में शांति, न्याय और कानून का शासन इतना दृढ़ था कि दूर-दराज के व्यापारी बेझिझक व्यापार करते थे और नगर के निवासी अपने घरों के दरवाजों पर ताले तक नहीं लगाते थे।
4. धार्मिक आस्था एवं कुलदेवी माँ हिंगलाज भवानी
शक्तिपीठ की छत्रछाया: अरोड़वंश के क्षत्रियों की मुख्य धार्मिक आस्था माँ हिंगलाज भवानी (हिंगलाज शक्तिपीठ) से जुड़ी रही है।
कुलदेवी पूजन: महाराज अरूट जी और उनका पूरा साम्राज्य माँ हिंगलाज को अपनी कुलदेवी के रूप में पूजता था। किसी भी शुभ कार्य, युद्ध या नए कार्य की शुरुआत से पहले माँ हिंगलाज की आराधना की परंपरा अरोड़वंश में सदियों से चली आ रही है।
5. ऐतिहासिक बदलाव, सिंधु का मार्ग और विस्थापन
प्राकृतिक आपदा (सिंधु नदी का मार्ग बदलना): 10वीं-11वीं शताब्दी के दौरान एक बड़ी प्राकृतिक घटना के तहत सिंधु नदी ने अपना मुख्य मार्ग (रूट) बदल लिया। इसके कारण जल-मार्ग से होने वाला व्यापार बुरी तरह प्रभावित हुआ और अरोड़कोट का वैभव घटने लगा।
विदेशी आक्रमण और पलायन: कालान्तर में उत्तर-पश्चिम से हुए विदेशी आक्रमणों और प्राकृतिक बदलावों के कारण अरोड़वंशी क्षत्रियों ने पंजाब (मुल्तान, लाहौर, लॉयलपुर) और उत्तर भारत के अन्य हिस्सों की ओर रुख किया।
वर्तमान स्वरूप: पंजाब और भारत के अन्य राज्यों में आकर अरोड़वंश के लोगों ने अपनी मेहनत, व्यापारिक कुशलता, कृषि और वीरता के बल पर पुनः समृद्धि हासिल की और समाज व राष्ट्र निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाई।
महाराज अरूट के प्रकाश उत्सव पर विशेष अरोड़ राजधानी से अरोड़ा जाति का आज तक का सफर
प्रस्तुत लेख अरोडवंश पर है, अरोडवंश समुदाय के लोग अपना अतीत जानने के लिए इसे अवश्य पढ़ें, हम कहां थे, कैसे बने, किन हालातों में हम गुजर कर यहां तक पहुंचे हैं? सिंध प्रदेश जो अब पाकिस्तान में है, यहां अरूट महाराज ने एक बहुत रमणीय राजधानी का निर्माण ईसा पूर्व में किया। जो अत्यंत सुंदर व वैभवशाली था, जिसका नाम अरोडक़ोट रखा। अरूट जी से बिगड़ा हुआ शब्द ही अरोड़ है, जिस से अरोड़वंश बना। यह महानगर भारत का व्यापारिक केंद्र था, यहां कभी भी घरों को ताले नहीं लगाए जाते थे, दूर-दराज के अंतरराष्ट्रीय व्यापारी व्यवसाय के लिए अरोड़ कोट आते-जाते थे। राज्य का भूगोल इस प्रकार था। पूर्व में कश्मीर तक, पश्चिम में मकरान तक, उत्तर की ओर कंधार तक, दक्षिण में सूरत तक था। हम यही अरोड़वंशी ही सूर्यवंशी है, हमारा वरुण क्षत्रिय है, कश्यप हमारा गौत्र है। अरोड़ एक विशाल राज्य था और अरोड़वंशी क्षेत्रीय धर्म का पालन करने वाले वीर-धीर नागरिक थे। अपने धर्म देश की रक्षा के लिए तन-मन न्योछावर कर देते थे। हमारा देश विभिन्न आचार-विचार एवं वेशभूषा वाले समुदाय का देश है, जाति प्रथा, अभी भी कहीं ना कहीं किसी कोने में छुपी हुई है, फिर भी अनेकता में एकता के भाव ने ही हमारे राष्ट्रीय जीवन को मुखर वह प्राणवाण बनाकर रखा हुआ है, अपनी जाति व वंश के प्रति सम्मान ही अपने राष्ट्र के प्रति समर्पित भावना ही हमारी संस्कृति की देन है। समय के बदलाव और भौतिक समस्याओं ने आज हमारे जीवन में बिखराव सा ला दिया है। सामाजिक कर्तव्यों के प्रति उदासीनता दिखाई पड़ रही है, परिणाम स्वरूप समाज में व्याप्त कुरीतियों, विषमताओं, झूठे आडम्बरों और रूढिय़ों से हम ग्रसित चले आ रहे हैं। खत्री (क्षत्री) एवं अरोड़ा समाज एक शरीर के दो हाथ है, यह दोनों हाथ मिलकर ही प्रेम, सद्भाव, सौहार्द की पावन गंगा प्रवाहित कर स्वस्थ व सुखी समाज की रचना में अपना पूर्ण योगदान दे रहे हैं। क्षेत्र व अन्य सभी शहरों में अरोड़वंश के प्रधानों व उनके सदस्यों द्वारा पूरी तनदेही से सेवा की जाती है और मुश्किल की घड़ी में टीमें जरूरतमंदों के लिए आगे आती रहती हैं। जो लोगों को अमन-चैन, सुख-शांति की प्रेरणा देते है, यह टीमें ऐसा स्त्रोत है, जो जन-जन में जाति-पाति की भावना को समाप्त कर उच्च जीवन शुभ विचार देने को अम्ल में ला रही हंै, हमारे पूर्वजों ने भी इसी बुनियाद पर अपने वंश की शानदार परम्परा कायम की है
ईसा की छटी शताब्दी में सिंध में, देवाजी ब्राह्मणों के वंशज में ‘साहसीराम’ नाम के राजा हुए है, इनकी राजधानी सिंधु नदी के पूर्वी तट पर, ‘अलोर अरोड़क़ोट’ थी। जिसे आजकल ‘रोड़ी’ कहते हैं। साहसी राय बौद्ध ब्राह्मण राजा थे, उनके प्रधानमंत्री का नाम ‘चच’ था, युनानी आक्रमणकारी सिकन्दर को भी महाराजा अरुट के वंशज सूर्यवंशी अरोड़वंशियों से लडऩा पड़ा था। सिकंदर के साथी और यूनान के महान इतिहासकार ‘पिलनी’ ने अरोड़ों को ‘अरोटरी’ लिखा है। चीनी यात्री ‘हयूनसंाग’ ने भी इसका वर्णन किया है। चच ने अपने सेनापतित्वकाल में खलिफाओं को बड़ी बार हराया था, ईष्र्या वश इस चच को पुराने अरोड़वंशी सरदारों ने (लोहान) इसे पदच्युत कर दिया और अधिकारों से वंचित कर दिया, इसे जूता पहनने, सिर पर कपड़ा रखने, चारपाई पर सोने की मनाही थी। जो अरोड़वंशी लाहौर आकर बसे बाद में सिंध, कच्छ और गुजरात में गए, वहां लोहाने कहलाएं। लाहौर जिसे ‘लव’ भगवान राम के बेटे के नाम से बना कहा गया है। उच्चारण बदलते-बदलते लोहाने बने। लाहौर को ‘लोह’ देश भी कहा गया है। यही लोहाने कहीं ‘लोहावरना’, तो कही ‘लोहावर’ भी कहलाएं। इस से भी पूर्व भारतवर्ष को ‘आर्यवर्त’ के नाम से जाना जाता था, इससे पूर्व ऋग्वेद में सप्त सिंधु के नाम से इसे संबोधित किया गया है, यह वह देश था जहां काबुल तक सिंधु, रावी, सतलुज, ब्यास, जेहलम, चुनाब, सरस्वती आदि नदियां बहती थी। आर्य जाति चार वर्णों में विभाजित थी, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, और शूद्र। सब के अलग-अलग कर्म निश्चित किए गए थे।
साहसी राय की मृत्यु के पश्चात ‘चच’ ने अरोड़ राज्य पर अपना अधिकार कर लिया, साहसी राय के सभी समर्थकों को चच ने अपने कोप का शिकार बनाया और साहसी राय की पत्नी ‘सहंदी’ से शादी कर 40 वर्ष तक राज्य किया। चच के समय भी अरब से बड़े आक्रमण हुए, पर उन्हें मुंह की खानी पड़ी। ईसवी सन् 637 में चच की मृत्यु हो गई और उसका भाई चन्द्र गद्दी पर बैठा और सात साल तक राज्य किया। सन् 644 में महाराजा दाहर ने गद्दी संभाली, जो अरोडक़ोट के अंतिम राजा थे। यह बड़े बहादुर, पराक्रमी, वीर, यशस्वी थे। ‘चचनामे’ में अरबों को बहादुर आक्रमणी और दाहर को जगह-जगह काफिर लिखा गया है। सन् 710 में सिंध पर फिर अरबों ने आक्रमण किया, इराक, बगदाद के खलीफा ‘वलीद’ ने अपने वजीर हैजाज को अरोड़ सिंध पर आक्रमण की आज्ञा दी। दाहर के पुत्र युवराज जयशाह और परम सहयोगी अरोड़वंशी ‘वीरमानु’ ने अरबों के छक्के छुड़ा दिए, इसी उपलक्ष में वीरमानु को अरुण (देवल) प्रांत का सेनापति नियुक्त किया गया। देशद्रोही ‘ज्ञानबुद्ध’ ने कायरता का परिचय देकर अरब आक्रमणकारियों को भडक़ाया और दोबारा आक्रमण करने के लिए कहा, ईसवीं सन् 712 में अरब सेना के सरदार ‘मोहम्मद बिन कासिम’ ने साठ हज़ार फौज के साथ, दोबारा सिंध पर आक्रमण कर दिया। यहां महाराज दाहर, उसका युवा पुत्र जयशाह वह वीरमानु ने अपनी 30000 सेना के साथ बड़ी वीरता से लड़ाई लड़ी। ज्ञानबुद्ध की धोखे बाजी व कायरता, गद्दारी ने सारी योजना निष्फल कर दी, इस विश्वासघात से मोहम्मद बिन कासिम की सेना ने अरोडक़ोट पर कब्जा कर लिया। महाराज दाहर और उसके बेटे को मार दिया गया, वीरमानु को कश्मीर जाना पड़ा। राजकुमारी सूर्य देवी युद्ध करती पकड़ी गई, छोटी राजकुमारी प्रवाल देवी युद्ध में घायल हो गई, दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया। मोहम्मद बिन कासिम ने सिंध का लूट का सामान व दोनों राजकुमारियों को उपहार में खलीफा की सेवा में भिजवा दिया। खलीफा बहुत प्रसन्न हुआ और दोनों से विवाह की योजना बनाई, राजकुमारी सूर्या देवी ने कहा- महाराज! हम आप के योग्य नहीं रही क्योंकि मोहम्मद बिन कासिम ने हम से बलात्कार किया है, खलीफा को बहुत बुरा लगा, उसने सेना को हुक्म दिया, जूठा माल भेंट करने वाले को जीवित ही पशु की खाल में सी कर मेरे सामने पेश किया जाए, ऐसा ही हुआ दोनों कन्याओं ने अपने पिता और भाई का बदला लिया कासिम की हालत देखी और कहा- परमात्मा तेरा लाख शुक्रहै। राजकुमारियों ने कहा महाराज हमने अपने पिता और भाइयों का बदला ले लिया है, दोनों ने अपने-अपने पेट में छुरा मारा और मर गईं। इसी प्रकार अरोड़ राजधानी और अरोडक़ोट और अरोड़ राज्य का पतन हुआ आजकल ‘रोड़ी’ रेलवे स्टेशन से आठ मील दूरी पर खंडहर के समान है, जिसे अब ‘रोड़ी टिल्ला’ कहते हैं, एक बड़ी नहर जो रोड़ी को जाती है, उसे ‘अरोड़वाह’ कहते हैं। लाहौर उस समय पंजाब प्रांत का बहुत बड़ा शहर व केंद्र था। यहां से जो लोग भागकर पंजाब की सिंध, जेहलम, चुनाव, रावी, सतलुज नदियों के किनारे कई शहरों में बस गए और इन्हें और अरोड़वंशी उत्तराधी, डाहिरे और दक्षिणे (दखणे) कहा गया। इससे पूर्व यह सारे एक ही थे लेकिन भगदड़ में सिंध छोडक़र भागने के बाद, इन में बहुत उपजातियां पैदा हो गई। जिन्हें ‘अल्ले’ भी कहते थे। उस समय उत्तर वाले दक्षिण वालों के घर शादी नहीं करते थे, शादी पर मामा या नाना लडक़ी को हाथी दांत का चूड़ा देते थे, कन्यादान के समय सफेद चूडिय़ों पर लाल रंग चढ़ाया जाता है और सफेद चूड़ा बिल्कुल नहीं पहनाते थे। यह लाल चूड़े वाले उत्तराधी, सफेद चूड़े वाले दखणे थे, लाल और सफेद चूड़े वाले डाहरे थे। आजकल अरोड़ों में कुल 810 उपजातियां अल्ले हैं।
प्राचीन मत में लोग कहते हैं कि सिंध में ’स’ को ‘ह’ बोलने की प्रथा थी, सिंधु को हिंदू बोलते थे, नई खोज़ों में यह साबित हो गया है कि यह सब कुछ मुस्लिम इतिहासकारों ने गलत फैलाया था, जबकि हिंदू शब्द आदिकालीन है, इसके प्रमाण निम्नलिखित है:- हिंदू कौन है? हीनं दुष्यति इति हिंदू: अर्थात्:- जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करें, उसे हिंदू कहते हैं। हिन्दू शब्द करोड़ों वर्ष प्राचीन संस्कृत शब्द है, यदि इस का संधि विच्छेद करें, तो पाएंगे हीन+दू= हीन भावना से दूर। अर्थात्:- जो हीन भावना या दुर्भावना से दूर रहे, वह हिंदू है। हमें बार-बार सदा झूठ ही बताया जाता है कि हिंदू शब्द मुगलों ने दिया जो सिंधु से हिंदू हुआ, हिंदू शब्द की उत्पत्ति वेद से हुई है, कहां से आया हिंदू शब्द हमारे वेदों पुराणों में, हिंदू शब्द का उल्लेख मिलता है। जैसे ऋग्वेद के बृहस्पति अग्यम में, हिंदू शब्द को इस प्रकार कहा गया है। हिमालयं समारम्य यावत इन्दुसरोवरं, तं देवनिर्मित देशं हिदुस्थानं प्रचक्षते। अर्थात:- हिमालय से हिन्दू सरोवार तक देव निर्मित देश को हिंदोस्तान कहते हैं। केवल वेद ही नहीं, शैव ग्रंथ में भी हिन्दू शब्द को उल्लेख इस प्रकार किया है। हीनं च दूष्यतेव हिन्दुरित्युच्च ते प्रियं। अर्थात्:- जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करें, उसे हिन्दू कहते है। ‘पारिजातहरण’ में हिंदू को इस प्रकार कहा गया है, हिनस्ति तपसां पापां दैहिकां दुष्टम्। हेतिभि: श्त्रुवर्गं च, स हिन्दुर्भिधियते।। जो अपने तप से शत्रुओं का, दुष्टों का और पाप का नाश कर देता है, वही हिंदू है। ‘माधवदिग्विजय’ में भी हिंदू शब्द को इस प्रकार उल्लेेखित किया है, ओंकारमन्त्रमूलाढय पुर्नजन्म द्रढाशय: गोभक्तो भारत: गुरूहिन्दुर्हिसन दूषक। वह जो ओंकार को ईश्वरीय धुन माने, कर्मों पर विश्वास करें, गोपालक रहे, तथा बुराईयों से अपने को दूर रखे, वही हिंदू है। अंत में यही कहेंगे कि आज भी प्रत्येक यज्ञ, पितर, श्राद्ध, दान, संकल्प विवरण, गोत्र, आचरण के समय क्षत्रिय वर्ण और वर्मा पद से उच्चारण किए जाते हैं, जैसा कि क्षत्रियों के लिए शास्त्रों में हुए वर्मा, ब्राह्मणों के लिए शर्मा, वैश्यों के लिए गुप्ता आदि नियत है। अरोड़वंश जाति हिंदू द्विजन्मा क्षत्रिय वर्ग से है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश राजस्थान में अरोड़़ें क्षत्रियों के नाम से जाने जाते हैं। संबंधित जानकारियां अरोड़वंश इतिहास नामक पुस्तक से ली गई है, जिसके लेखक देश प्रेमी डॉ ओमप्रकाश जी हैं।
करनाल ( पाण्डे जी की कलम से )
‘भगवान श्रीराम का वंशज है अरोड़ा समाज’
अरोड़ा समाज के इतिहास के अनुपम प्रवर्तक अरूट महाराज का संदेश था कि अपनी उन्नति के लिए प्रयत्न करने के साथ समाज की प्रगति में प्रयत्नशील रहना हर सभ्य नागरिक का सामाजिक उत्तरदायित्व है। 30 मई से 30 जून का तक का समय इस निर्भय समाज के लिए उमंग से भरपूर होता है, जब वह अपने युग प्रवर्तक अरूट जी महाराज को शीश झुकाकर शुभाशीष लेते हैं कि वह अपने समाज की संवेदनाओं और अपेक्षाओं के पूर्ण रक्षक बन इसे नेतृत्व प्रदान करेंगे।
अरोड़ा समाज के इतिहास के बारे में अखिल भारतीय अरोड़ा एवं खत्री महासभा के संस्थापक अधिवक्ता हरीश आर्य ने कहा कि रामायण के बालकांड में गुरु वशिष्ठ द्वारा राम के कुल का वर्णन किया गया है जिसमें बताया गया है कि ब्रह्माजी से मरीचि का जन्म हुआ। मरीचि के पुत्र कश्यप हुए। कश्यप के विवस्वान और विवस्वान के वैवस्वतमनु हुए। वैवस्वतमनु के दस पुत्रों में से एक का नाम इक्ष्वाकु था। जिन्होंने अयोध्या को अपनी राजधानी बनाया और सूर्यवंश की स्थापना की। इन्हीं के कुल से आगे चलकर सगर, भागीरथ, रघु, अम्बरीष, ययाति, नाभाग, दशरथ और भगवान राम हुए।
वहीं महासभा के चेयरमैन राकेश मदान ने अरूट महाराज का जिक्र करते हुए कहा कि भगवान श्रीराम के पुत्र लव को लाहौर का राज्य उत्तराधिकार में मिला था तो उनके कुल में कालराय राजा हुए। उनकी 2 रानियां थीं। एक रानी का पुत्र शांत स्वभाव का था इसलिए उसे अरूट कहा जाता था। राजा ने मंत्री की राय से अरूट को अपना सारा खजाना दे दिया तथा दूसरी रानी के पुत्र छोटे राजकुमार को राज्य का उत्तराधिकारी मनोनीत किया। बड़े राजकुमार अरूट ने लाहौर नगर छोड़कर मुल्तान की ओर प्रस्थान किया, साथ ही अनेक नागरिक और सैनिक राजा की आज्ञा का पालन करते हुए चल पड़े। सिंधु नदी के किनारे एक किला बना उसका नाम अरूट कोट रखा जिसे तत्पश्चात अरोड़कोट कहा जाने लगा।
अरोड़वंश में 930 से ज्यादा उपजातियां, ज्यादातर को पता नहीं
अरोड़वंश का इतिहास जितना बड़ा है, उसमें उतनी ही उपजातियां भी हैं। अरोड़वंश की करीब 810 उपजातियां हैं, करनाल में ही इस वंश की जनसंख्या करीब 30 लाख है। अरोड़ा महासभा के अध्यक्ष जगदीश मुतरेजा, संरक्षक डा. लाजपत राय चौधरी, रूप नारायण चानना, जे.आर. कालड़ा, अनिल सहगल, राकेश नागपाल ने बताया कि अरूट जी महाराज को पुष्पांजलि देकर उनके जीवन मूल्यों को स्मरण करें तो याद रखना होगा कि हम भावी पीढ़ी में अपने सेनापति के आदर्शों व उनके जीवन मूल्यों को हर कार्यकर्त्ता के मस्तिष्क तक पहुंचा समाज को उत्कृष्टता की भावना से जागरूक करेंगे।